मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

दुर कहीं सितारो के बीच देखा है एक चाँद मैनै !

     चाहता हुँ मै भी उसे पाना !

     और बढा देता हुँ दो कदम उसे पाने की चाह मे !

     सहसा....

     ठिठक जाता हुँ मै !

    याद आने लगते है,

    मेरे फर्ज , मेरी मर्यादा !

    होने लगता हुँ हकिकत से ऱुबरु,

    दिल और दिमाग की इसी जंग मे !

    आखिरकार हार जाता है दिल......,
    और जीत जाता है दिमाग !

    लौटा देता हुँ कदमो को मायुसी के साथ ,

    उससे दुर , बहुत दुर

    यही सोचकर !

    मिलेंगें नही शायद इस जनम ,
    मिलेंगें शायद अगले जनम !

    शायद अगले जनम ! ....{ अधीर }...

10 टिप्‍पणियां:

  1. दिल और दिमाग की इसी जंग मे !
    आखिरकार हार जाता है दिल......,
    और जीत जाता है दिमाग
    दिल भले हारा लगता हो लेकिन इंसान बड़ा बना जाता है !!

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  2. @Vibha di....sarahna ke sath aap agar kamiya batayegi to aur achha lagega ....Abhar apka

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  3. @Panchhi ji ....magar iss jung ko ladna akele hi padta hai ....Sadar

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  4. दिल और दिमाग की जंग में अगर दिल की जीत होती भी है तो वो सामाजिक प्रष्ठभूमि पर पिछड़ जाता है - प्रशंसनीय प्रस्तुति

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  5. होने लगता हुँ हकिकत से ऱुबरु,
    दिल और दिमाग की इसी जंग मे
    ... होना ही पड़ता है अक्‍़सर
    अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने ... उत्‍कृष्‍ट लेखन
    आभार

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  6. मिलेंगें नही शायद इस जनम ,
    मिलेंगें शायद अगले जनम !

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