बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

हमारी आँखें

बिछुङने का दर्द, भुलें नहीं हम अब तक,
रस्ता देख रही है ,हमारी बिलखती आँखें।

मुद्दत हो गयी है, उन्को रुबरु देखे हुये भी,
इंतजार करती है,हमारी सिसकती आँखें।

टुटकर बिखर गये है,हम उन्की जुदाई मे,
नमी को तरसी थी,आज है बरसती आँखें।

दम घुटता है अब,तन्हाई के इन अंधेरों मे,
बंद हो जायेगी ,बिन देखे ही तरसती आँखें। {अधीर }

31 टिप्‍पणियां:

  1. दम घुटता है अब,तन्हाई के इन अंधेरों मे
    ------------------------------
    दर्द झलकता है अधीर साहब .....

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  2. नजर जिसकी तरफ करके,तुम निगाहें फेर लेते हो,
    क़यामत तक फिर उस दिल की परेशानी नही जाती,,,,,

    RECENT POST बदनसीबी,

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  3. वाह ... बेहतरीन भाव
    बहुत ही बढिया लिखा है आपने ... आभार

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  4. टुटकर बिखर गये है,हम उन्की जुदाई मे,
    नमी को तरसी थी,आज है बरसती आँखें..

    ये जुदाई का असर है ... मुहब्बत में ऐसा होता है ...

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  5. मुद्दत हो गयी है, उन्को रुबरु देखे हुये भी,
    इंतजार करती है,हमारी सिसकती आँखें।

    वाह ...बहुत ही बढिया....

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  6. दम घुटता है अब,तन्हाई के इन अंधेरों मे,
    बंद हो जायेगी ,बिन देखे ही तरसती आँखें। {अधीर }

    .....वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

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  7. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती,आभार अधीर जी।

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  8. बहुत ही अच्छा लिखा है ...
    हर पंक्ति में वियोग का भाव बखूबी समाया है..
    बहुत ही लाजवाब..
    बेहतरीन....

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  9. अदभुत--बहुत सुंदर
    बहुत बहुत बधाई

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  10. बहुत सुन्दर रचना!
    http://voice-brijesh.blogspot.com

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